देखते ही देखते दो दिन… और शक्ति नहर के किनारे सैकड़ों परिवारों का आशियाना मिट्टी में मिल गया। कल अवैध निर्माण ध्वस्त हुए थे, आज सुबह से फिर बुलडोजर गरजे और बचे हुए मकानों को भी जमींदोज कर दिया गया। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में एक भी ईंट खड़ी रहने नहीं दी गई। मलबे के बीच महिलाओं की चीखें, बच्चों का रोना और बुजुर्गों की बेबसी… ये तस्वीर किसी को भी झकझोर देने वाली है। सर्द हवाएँ चल रही हैं और ये लोग अब खुले आसमान के नीचे हैं कानून की नजर में अतिक्रमण गलत है, इसमें कोई दो राय नहीं। सरकारी जमीन पर कब्जा करना दंडनीय अपराध है और उसे हटाना प्रशासन का कर्तव्य भी है। लेकिन सवाल ये है कि जब ये मकान धीरे-धीरे बन रहे थे, जब एक-एक करके दीवारें ऊँची हो रही थीं, जब छतें डाली जा रही थीं… तब पूरा सिस्टम कहाँ था? नोटिस दिए गए थे, ये बात प्रशासन बार-बार दोहरा रहा है। लेकिन नोटिस देने के बाद दशकों तक कोई कार्रवाई न करना क्या उतनी ही बड़ी नाकामी नहीं? बिजली के मीटर लगे, पानी का कनेक्शन मिला, वोटर लिस्ट में नाम जुड़े, राशन कार्ड बना, आधार में यही पता लिखा गया… और तो और, सरकारी खर्चे से सड़कें तक बन गईं। तो सवाल ये भी उठता है – क्या वो तमाम अफसर और अमला जिम्मेदार नहीं हैं जिनके कंधों पर सरकारी जमीन की निगरानी और सुरक्षा की जिम्मेदारी थी? बिजली-पानी देने वाली टीमें, राजस्व विभाग की निगरानी टीमें, स्थानीय निकाय के अधिकारी – क्या ये सब बेगुनाह हैं? आज गरीब की जिंदगी भर की कमाई मलबे में दब गई, तो फिर इन लापरवाह अफसरों से भरपाई क्यों नहीं की जा रही? क्या सिर्फ़ गरीब को ही कानून की मार झेलनी है… और सिस्टम की नाकामी का खामियाजा सिर्फ़ वही भुगतेगा?
कानून कहता है – अतिक्रमण की सूचना मिलते ही 15 से 30 दिन में बेदखली होनी चाहिए। फिर दशकों तक खामोशी क्यों? अगर वक्त रहते कार्रवाई हो जाती तो आज किसी गरीब की जिंदगी भर की कमाई मलबे में नहीं दबती। अपने घर को बुलडोजर के नीचे कुचले जाने से बचाने की आखिरी कोशिश में… लोग घरों की छत पर चढ़ गए। बुजुर्ग… सब ऊपर चढ़कर चीखते रहे, रोते रहे… कि किसी तरह उनका आशियाना बच जाए।कुछ लोग तो जेसीबी मशीन के आगे खड़े हो गए, ताकि बुलडोजर आगे न बढ़े। लेकिन मिनटों में वो छतें भी मलबे में तब्दील हो गईं। और सबसे बड़ा सवाल – अभी तक इन बेघर परिवारों के लिए कोई पुनर्वास की बात क्यों नहीं हुई? कानून का पालन करना जरूरी है, लेकिन कानून के साथ इंसानियत भी तो चलनी चाहिए। मौके पर मौजूद उप जिलाधिकारी विनोद कुमार से जब यही सवाल किए गए तो सुनिए उन्होंने क्या कहा… नोटिस दिए गए थे… ये बात सही है।लेकिन नोटिस का मतलब सिर्फ कागज पर लिखना नहीं, उसका असर दिखाना भी होता है।कानून अपना काम कर रहा है, इसमें कोई शक नहीं।लेकिन सवाल ये भी है कि क्या सिस्टम ने अपना काम समय पर किया था? ये सवाल आज भी बाकी है… और शायद कल भी रहेगा।
