उत्तराखंड से एक गंभीर रिपोर्ट… केंद्र सरकार ने खनन सुधारों के लिए प्रदेश को कुल 200 करोड़ रुपये का इंसेंटिव दिया है—अक्टूबर में 100 करोड़ और नवंबर में अतिरिक्त 100 करोड़। यह राशि राजस्व बढ़ोतरी और नीतिगत सुधारों की मान्यता में मिली है। सरकार का दावा है कि अवैध खनन पर पूर्ण रोक है और सब कुछ नियंत्रण में है। लेकिन जमीनी हकीकत खासकर ढालीपुर में कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। यहां आवंटित खनन पट्टे की लीज सीमा से बाहर बड़े स्तर पर अवैध खनन चल रहा है। हालिया छापेमारी में दो 10 टायर और एक 6 टायर डंपर अवैध गतिविधि में पकड़े गए, जिन पर ढाई लाख रुपये का जुर्माना लगा—लेकिन दर्जनों अन्य वाहन टीम को देखकर फरार हो गए। यह साफ इशारा है कि माफिया कितने बेखौफ हो चुके हैं।

पछवादून की नदियों और क्षेत्रों में लीज की आड़ में सीमाओं से बाहर खुदाई आम बात हो गई है। ओवर हाइट बॉडी वाले ट्रक-डंपर अवैध खनिज सामग्री ढोते सड़कों पर दौड़ रहे हैं, लेकिन प्रभावी रोकटोक नहीं दिख रही। सूत्रों का कहना है कि अगर सरकार को 100 रुपये राजस्व मिल रहा है, तो माफिया इससे कई गुना ज्यादा अवैध खनन से अपनी जेबें भर रहे हैं।चिन्हित स्थानों पर ही खनन की वैज्ञानिक अनुमति होती है, ताकि पर्यावरण और भू-संरचना सुरक्षित रहे। मगर ढालीपुर जैसे मामलों में लीज की आड़ में अन्य जगहों पर हो रही खुदाई से नदियों का स्वरूप बदल रहा है, ढलान अस्थिर हो रहे हैं—जिसका खामियाजा आने वाली आपदाओं के रूप में प्रदेश की जनता भुगतेगी।विभाग की छापेमारी होती है, जुर्माने लगते हैं, वाहन पकड़े जाते हैं—लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अवैध गतिविधियां थम क्यों नहीं रही? राजस्व की यह बढ़ोतरी सराहनीय है, लेकिन क्या यह पर्यावरण और नियमों की कीमत पर हो रही है? सरकार और प्रशासन से उम्मीद है कि राजस्व के साथ-साथ सख्ती से अवैध खनन पर अंकुश लगेगा, ताकि हिमालयी राज्य की नाजुक पारिस्थितिकी सुरक्षित रहे। सच्चाई सामने लाना जरूरी है… क्योंकि आने वाली पीढ़ियां इसका हिसाब मांगेंगी!
https://youtu.be/g_ex76Ql2UM?si=tblbEvsrAKRjZIHo
