देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस अपना रखा है और उन्होंने दो टूक संदेश दिया हुआ है कि अगर किसी ने भी भ्रष्टाचार या घोटाला करने का दुसाहस किया तो उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही अमल में लाई जायेगी। उत्तराखण्ड मंे भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह से एक्शन हो रहे हैं उससे अफसरों के मन में भी भय है कि अगर उन्होंने कोई भ्रष्टाचार करने का दुसाहस किया तो उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही अमल मे लाई जायेगी। हैरानी वाली बात है कि होमगार्ड एवं नागरिक सुरक्षा विभाग में वर्दी सामग्री से जुडे कथित घोटाले में डिप्टी कमांडेंट को सरकार ने निलम्बित कर दिया लेकिन सवाल यह है कि जब वर्दी खरीद का अभी तक भुगतान ही नहीं हुआ तो फिर आखिर करोडो रूपये का घोटाला कहां से हो गया? इस कथित घोटाले को लेकर एक बहस छिड गई है कि अगर सरकार के मुखिया इसकी शासन के कुछ बडे अफसरों के नेतृत्व में एक एसआईटी का गठन कर उसकी जांच करा दें तो शायद वो राज भी खुलकर सामने आ सकते हैं जो अभी तक आवाम के बीच नहीं पहुंच पाये हैं?
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह सह धामी की भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रामक शैली से शासन और सिस्टम के अफसर अच्छी तरह से वाकिफ हैं इसलिए वह भ्रष्टाचार करने से अपने आपको हमेशा पीछे ही रखते हैं लेकिन होमगार्डस एवं नागरिक सुरक्षा विभाग में कथित वर्दी सामग्री खरीद से जुडे कथित घोटाले मे होमगार्ड के डिप्टी कमांडेंट अमिताभ श्रीवास्तव को सरकार ने निलम्बित कर दिया। इस निलम्बन के बाद कई सवाल आखिर खडे हो गये हैं जिसका जवाब अभी एक पहेली ही है। सवाल तैर रहे हैं कि होमगार्ड विभाग में वर्दी घोटाला सच है या कोई साजिश? विश्वस्तसूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली में पांच लाख के अधिक मूल्य की समस्त सामग्रियों की अधिप्राप्ति हेतु शासकीय अधिप्राप्ति पोर्टल का उपयोग करके इलैक्ट्रोनिंक अधिप्राप्ति पद्वति का पालन करना सभी अधिप्राप्ति इकाईयों के लिए अनिवार्य किया गया है। सवाल उठता है कि ई टेंडर निकालने की लिखित स्वीकृति विभागाध्यक्ष द्वारा दी जाती है तो पता चला कि हां ऐसा भी हुआ है। सवाल यह कि क्या ई टेंडर को लोग अधिप्राप्ति पोर्टल और दो अखबार में निकाला जाता है तो ऐसी चर्चा है कि हां ऐसा भी हुआ है। सवाल की ई टेंडर में इन्हीं निविदादाता के प्रकरणों पर विचार किया जाता है जिनके द्वारा उसमें प्रतिभाग किया गया था तो पता चला कि हां ऐसा भी हुआ है। सवाल उठा कि क्या तकनीकी और वित्तीय निविदा मूल्याकंन रिपोर्ट को मूल्याकंन संवीक्षा समिति के सभी सदस्यों द्वारा साईन किया जाता है तो यह भी पता चला है कि सभी उपस्थित सदस्य द्वारा साईन करना होता है, और ऐसा हुआ भी है।

बताया जाता है कि मूल्यांकन संवीक्षा समिति का गठन विभागाध्यक्ष द्वारा किया जाता है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या ई टेंडर में न्यूनतम बोलीदाता एल-1 ऑनलाइन ही चिन्हित था या मूल्यांकन सवीक्षा समिति ने खुद से चिन्हित किया तो यह बात भी उठ रही है कि ऑनलाइन चिन्हित होता है और इसमे भी ऐसा ही हुआ। बहस चल रही है कि क्या ई टेंडर में सामग्री का निर्धारण मूल्याकंन संवीक्षा समिति के द्वारा किये जाने का अधिप्राप्ति नियमों में कोई प्राविधान है तो पता चला कि ऐसा कोई प्राविधान नहीं है। सवाल खडे हो रहे हैं कि क्या ई टेंडर में सामग्री का पूर्व निर्धारण स्थानीय सर्वे के आधार पर मूल्यांकन संवीक्षा समिति के द्वारा किये जाने का अधिप्राप्ति नियमों में कोई प्राविधान है तो जानकारों का कहना है कि ऐसा कोई प्राविधान नहीं है परंतु सक्षम प्राधिकारी विभागाध्यक्ष द्वारा ऐसा किये जाने का निर्णय न्यूनतम बोलीदाता के पक्ष में क्रय आदेश जारी करने की स्वीकृति से पूर्व किया जाना औचित्यपूर्ण एवं तार्किक हो सकता है जो इस मामले में विभागाध्यक्ष ने नहीं किया?
सवाल तैर रहे हैं कि सात सामग्री का ई टेंडर निकला था। बताया जाता है कि एक सामग्री स्लीपिंग बैग को छोडकर छह सामग्री की स्वीकृती हुई थी और चर्चा है कि छह सामग्री को क्रय करने की स्वीकृति विभागाध्यक्ष द्वारा लगभग 28 दिनों बाद दी गई थी। सवाल खडा होता है कि 28 दिनों तक इसकी स्वीकृति क्यों नहीं दी गई और आखिर जब सात सामग्री का ई टेंडर उन्हीं की स्वीकृति से निकाला गया तो स्लीपिंग बैग को क्यों छोडा गया?
चर्चा यह है कि यहीं से कुछ ऐसा हुआ जिसने सारा मामला घुमा दिया है? अब यह सवाल भी खडा हो रहा है कि इस ई टेंडर को कब, क्यूं और किसने निरस्त किया? बताया जा रहा है कि ई टेंडर को अक्टूबर 2025 के आखिरी सप्ताह में विभागाध्यक्ष ने कैंसिल किया? बताया जा रहा है कि उसका कारण ई टेंडर सामग्री का अधिक मूल्याकंन होना बताया गया जबकि ऑनलाइन चिन्हित न्यूनतम बोलीदाता को क्रय आदेश की स्वीकृति विभागध्यक्ष ने ही पहले 28 दिनों के बाद फाइल पर पहले सात सामग्री के स्थान पर छह सामग्री को क्रय करने की स्वीकृति खुद लिखित मे दी गई और अब खुद ही ई टेंडर कैंसिल किया, तो सवाल खडे हो रहे कि ऐसे में इस सब में अमिताभ कहां से दोषी बना दिये गये?
गोपनीय जांच कैसे हो गई उजागर?
गोपनीय जांच उजागर होना सवालों के घेरे में
देहरादून। हैरानी वाली बात है कि गोपनीय जांच शासन में गतिमान हो और ऐसे में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों पर लागू आचरण नियमावली का उल्लंघन होना कई सवालों को जन्म दे जाता है? सवाल खडे हो रहे हैं कि अखिल भारतीय सेवाओं का आचरण नियमावली का यह स्पष्ट उल्लंघन है। साथ ही इसकी वजह से विभाग, शासन और सरकार की छवि भी कहीं न कहीं धूमिल हुई है? सबसे चौकाने वाली बात है कि कांग्रेस के नेता का एक बयान आया जिसमें उन्होंने एक बडे पुलिस अफसर की तारीफ की यह एक अत्यंत संवेदनशील प्रकरण है जिसकी गंभीरता से उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए कि कहीं यह सब वर्तमान सरकार को बदनाम और अस्थिर करने की कोई साजिश तो नहीं? सवाल यह भी खडे हो रहे हैं कि एक डीआईजी की जांच उसका जूनियर अधिकारी कैसे कर सकता है और इसी से कई सवाल अब इस कार्यवाही के बाद से उठने शुरू हो गये हैं और यह बात भी उठ रही है कि अगर सरकार के मुखिया इस मामले की जांच कुछ बडे अफसरों की एसआईटी बनवाकर करायें तो उससे सारा सच सामने आ सकता है?
